Sunday, February 9, 2014

काँटों का उपहार

धन्यवाद तुम्हारा
क्षमा कर दो मुझे
मैं आया था कि
अतीत की कड़वी स्मृतियां
जो तुमने मुझ को
पिला दी थीं विष की तरह
लौटा दूँ
कह दूँ इन्हें सुरक्षित रख लो
अपने लिए
कि कड़वाहट लगती है  
सुन्दर और प्यारी
मधुरता की मित्रता में ही
प्रतीक्षा
मिल्न की आशा पर की जाती है  
पर समक्ष मेरे बिछे हैं  
केवल प्रतीक्षा के कांटें
और उम्मीद का कोई नाम नहीं
यह जानकर भी
कहो मैं कैसे आगे बड़ों
तुहें वापस लौटा लूँ
तो अछा है  
तुम्हारा यह
काँटों का उपहार .
____________________________________________________
जब

जब ...
सपने टूटकर
पीड़ा का रूप धरें
साँस बिखर कर  
विनाश का विलाप बने
प्रकाश की कोख से
अन्धकार जन्म ले
विचार के स्रोत
रेंगते-रेंगते
सांप बनकर
डसने का प्रयत्न करें
कलम की जीभ
लिखते-लिखते
बरछी बनकर
सभ्यता के सीने को चीरे
धर्म के पेड़ पर
पाप उग आयें  
देवताओं का प्रसाद
विष बनकर
गले में ही अटक जाए
तब विचार की वाणी
विवेक की वाणी
सिसक-सिसक कर  
दम तोड़ती है  .

_______________________________________________
भागलपुर
(भागलपुर में हुए साम्प्रदायिक दंगों पर )

संक्रीणता को ग्रहण कर
मानवता को तज कर  
कौन हो गया है  
इस प्रकार निर्वस्त्र ?
खून की नदियाँ
किसने बहा दीं
मानवता की लाश दफना दी
किसकी पुत्री नग्न पड़ी है  
किसकी देह उधर सड़ी है  
किसने यह सिंदूर मिटाया
किसने यह घुंघट उठाया
कौन भक्त यह
कैसा धर्म यह
चाँद पर चढने वाले लोगो
ए समाज के ठेकेदारों
भागलपुर की सडकों की यह
खून की धारा पूछती है  
राम की क्या इच्छा यही थी
मोहम्मद का फ़रमान यही था
मस्जिद को इक कब्र बनाओ
मन्दिर को इस चिता बनाओ
रीत जलाने की ही चली जो
नफ़रत को तुम क्यों न जलाते
मार-धाड़ की रीत चली जो
बुरे विचारों को तुम मारो
तुम सब दीवानों के आगे
मैं अधबुझे शब्दों का सौदागर
फैलाए भिक्षा पात्र ,माँगता हूँ
प्रेम की भिक्षा
शान्ति की भिक्षा  
समाज की आँखों से आंसू पोंछ कर
इनमें सारा प्रेम अन्ज्कर
मेरी पीड़ा ,मेरे दर्द को
कम कर दो
मैं एक शब्दों का मतवाला
अपने कंपित हाथों में
थामे भिक्षा पात्र
मांग रहा हूँ
भिक्षा संस्कृति की
और मानवता की .
_____________________________________________________
प्यार है ख़ुशबू जिधर भी जाए
(सरिता के साथ हुई पहली मुलाक़ात का काव्यात्मक चित्रण)

पहली  बार मिले हम दोनों
मन्दिरों के शहर में जाकर
ख़ुशबू जैसी चढ़ी थी गाडी
मेरे निकट बैठ गई थी
नज़रों की भाषा में हमने
बातें की थीं
आँखों के लग्न-मण्डप में
एक-दूजे को
वर-मालाएं फनाईं थीं
मेरे पास थी इक पुस्तक
कविताओं की
सरगोशी में तुमने मांगी
दिल की पुस्तक ,प्यार की पुस्तक
दुधिया हाथ में तेरे थामी
बातें की थीं ,बहुत सी बातें
घायल-घाटी की थीं बातें
उजड़े-घरों की ,बिछुड़े हुओं की
हत्यारों के कुकर्मों की बातें
मानवता के मरहम की बातें
तुम ही ने तो यह भी कहा था
प्यार है ख़ुशबू जिधर भी जाए
महकाता है दिल में फूल
मन ही मन में ,मैं ने कहा था
तुम सरिता और मैं हूँ प्यास
 निकाली गई थी शहर से अपने
उसी शहर में
पीछे मुडकर मैं भी देखा
शाप लगा और पत्थर बना हूँ
पीते हैं हम लोग यह जीवन
फटे-दूध वाली चाय की तरह
मैंने भी कुछ ऐसा कहा था
गाडी रुकी थी एक मोड़ पर
हिरनी-जैसी तुम उतरी थीं
पीछे मुड़ कर तुमने दी थी
एक मुस्कुराहट सूर्य-किरण सी
सुनता हूँ मैं आज भी आहट
अपने दिल की पगडंडी पर
हिरनी के उस चलने की
वह क्षण तो उपवन बना था
ख़ुशबू से सब कुछ महका था
तुम ही ने तो यह भी कहा था
प्यार है ख़ुशबू जिधर भी जाए
महकाता है दिल में फूल
मन ही मन में मैंने कहा था
तुम सरिता और मैं हूँ प्यास .  
(26नवम्बर 1997-जम्मू )
_________________________________________________
हमारी अम्मा की ओढ़नी

वे जब आते हैं रात-समय
दस्तक नहीं देते हैं  
तोड़ते हैं दरवाजे़
और घुस आते हैं हमारे घरों में
वे दाढ़ी से घसीटते हैं  
हमारे अब्बू को
छिन जाती है  
हमारी अम्मा की ओढ़नी
या हम एक दूसरे के सामने
नंगे किए जाते हैं
सिसकती है शर्म
बिखर जाते हैं रिश्ते
वे नकाबपोश होते हैं
केकिन
हम खोज ही लेते हैं उनके चेहरे
अतीत की पुस्तक के एक एक पन्ने से
बचपन बिताए आंगन से
दफ़्तर में रखी सामने वाली कुर्सी से
एक साथ झुलाये हुए झूले से
स्कूल की कक्षा में बेठे लडकों से
हमारे बचपन के आंगन पर
रेंगते हें सांप
यमराज दिखाई देता है  
हमारी सामने वाली कुर्सी पर
जल जाती है  
हमारे बचपन के झूले की रस्सी
हम उस काली नक़ाब के पीछे छिपे
कभी उस लड़के का चेहरा भी देखते हैं
जिसको हमने पढ़ाया होता है
पहली कक्षा में
वे जब आते हैं रात-समय
ले जाते हैं जिसको वे चाहें घर-परिवार से
और कुछ दिनों के बाद
मिलती हे उसकी लाश
किसी सेब के पेड़ से लटकी
या किसी चौराहे पर लुथडी
मारने से पहले वे
लिख देते हैं अपना नाम
उसकी पीठ पर
आतंक की भाषा में
दहकती सलाखों से
आग के अक्षरों में
वे जब आते हैं रात-समय
दस्तक नहीं देते हैं  
तोड़ते हैं दरवाजे़
रोंदते हैं पाव तले
हमारी संस्कृति को
हमारे रिश्तों को

हमारी शर्म को .  

No comments:

Post a Comment