Sunday, February 9, 2014

तपस्या

तुम
तुम तो मेरी आशा हो
और मैं...
मैं अब भी तुम से
निराश नहीं हूँ
ये जग वाले
जन्म-मरण के चक्कर से
चाहते मुक्ति
मेरी इच्छा है  
जन्म-मरण के चक्कर की
बस तेरे लिए
ताकि
किसी भी जन्म में
पा तुमको सकूं
उस दिन होगी
सफल मेरी तपस्या
और मैं पाउँगा
उस दिन मुक्ति .
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भीतर की टूट-फूट

मैं जीवन पथ पर
चल रहा था अकेले
हर तरफ वीराना था
हर दिशा ख़ामोशी थी
एक शांति सी थी
और
अचानक सुनाइ दीं
कहीं से आवाज़ें
टूट-फूट की
मारा-मरी की
देखा चरों ओर मैंने
कहीं कोई न था
मेरे सिवा
कि वे आवाज़ें आरहीं थीं
मेरे ही भीतर से .
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तुम आओगी

स्वागतम
मैं जनता था
तुम अवश्य आओगी
और इसीलिए
मैंने पहले ही से
खोल रखे थे
दिल के किवाड़
और स्वयं
इस दिल के प्रवेश-मार्ग पर
बैठा था
तुम्हारे स्वागत के लिए
कि तुम आओगी
और जलाओगी
इस अंधकारमय दिल में
प्रेम-दीप .
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उपहार

मेरे लिए
हर दिन जन्म लेती हो
तुम
कोमल सुबह बन कर  
हरियाली के चेहरे पर
ओस बनकर
मैं हर सुबह
चुनता हूँ
कुछ स्मृति-बूंदें
अपने भविष्य के लिए
इस कारण हर दिन
तुम्हारा जन्म-दिन है  
मेरे लिए
और मैं हर दिन
तुम्हें एक नया उपहार
एक नई भावना देता हूँ
कभी आंसुओं की माला
कभी एक नई  कविता.
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अग्नि कुण्ड

मेरा संसार
एक अग्नि कुण्ड है  
और मैं
एक उधेड़बुन में उलझा हूँ
अपनी इच्छाओं की
अपनी भावनाओं की
आहुति दे रहा हूँ
इस अग्नि कुण्ड में
जन्म-जन्म से
उठ रह हे धुआँ
मेरी इच्छाओं का
भावनाओं का
इस धुएं ने मेरी चारों ओर
एक जाल बुना है  
जिसमें मैं उलझ गया हूँ
और केवल एक शून्य बनकर
रह गया हूँ.
      *
एक शून्य
जो स्वयं कुछ नहीं होता  
किन्तु
दूसरों के हाथ लगकर
दूसरों को लाभ पहुंचाता है  
दूसरों को खुश रखता है  
और अपने लिए बुनता है  
एक शाश्वत
एक शून्य
अर्थहीन.
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जाने कौन आस पास होता है

जब तुम नहीं होती हो
मेरे समक्ष
मैं अपनी डायरी खोलकर
अपनी कविताओं का
घूंघट उठता हूँ .
धीरे-धीरे शब्द
जीवित हो जाते हैं .
अपना आकार
बदल देते हैं .
और तुम्हारे नख-शिख में
ढल जाते हैं .
बालों की बदलियाँ
लहराती हैं .
आँखों के दीये
जल उठते हैं .
होठों के कमल
खिल उठते हैं .
चहरे के चाँद का
उदय होता है .
तुम्हारी सरगोशियाँ
फूटती हैं .
भावनाएं उमड़ती हैं
कहकहे उबलते हैं .
थोड़े समय बाद
दूर शहर की
बनकर-बस्ती से
गोलियों की गूंज
सुमाई देती है
चीखने-चिल्लाने की
आवाज़ें आती हैं
तुम सहम जाती हो
बदलियाँ बिखर जाती हैं
दीये बुझ जाते हैं
कमल मुरझा जाते हैं
चाँद को ग्रहण
लग जाता है
और तुम
विलीन हो जाती हो .
मेरे समक्ष
कविताओं के
अंधे , गूंगे
और शापित शब्द
रह जाते हैं
कठोर और अथरीले.

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मैं तो पहले ही कहता था

मैं तो पहले ही कहता था
पेड़ों पर बिजलियाँ मत गिराओ
परिंदे तो उड़ ही जाएंगे
किन्तु
तुम्हारे उपवन की सारी टहनियां
जल कर भस्म हो जाएंगी
जिन पर आने वाले समय की
साडी खुशबू
और कुछ परिंदों के जले हुए पर
विलाप करेंगे.
        *

मैं तो पहले ही कहता था
नफ़रत करने के अधिकार को
अपने नियम में जगह मत दो
कि नफरतों की बाढ़
फैलते-फैलते
तुम्हारे आंगन तक भी पहुंच जाएगी
और तुम अपने ही बच्चों की
अंतिम हिचिकयाँ भी
न सुन पाओगे
          *

मैं तो पहले ही कहता था
अपने चरों ओर
डर,तन्हाई और साम्प्रदायिकता की
कंटीली बाड़ मत बिछाओ
कि फिर विशवास और मानवता
इसको फलांगते हुए
रक्त-रक्त हो जाएगी
और तुम्हारे अंदर का मनुष्य
घुट-घुट कर  
मर जाएगा.
         *

मैं तो पहले ही कहता था

मेरी उंगलियाँ मत काटो
कि इनसे टपकने वाले
खून की हर बूंद से
एक ऐसी कविता रच जाएगी
तो तुम्हारी सारी तलवारों को
कट के रख देगी
          *
मैं तो पहले ही कहता था
प्रेम को शरीर का रूप मत दो
फिर भावनाओं की सभी
सुनहरी चिड़ियाँ उड़कर
उतनी दूर चली जाएंगी
कि तुम्हारे पास
न प्रेम की दहकती लपट रहेगी
और न ही
शरीर की धीमी आंच .
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सर्वव्यापी

हर एक जगह तुम ही तुम हो
जिधर भी देखूं
जहां भी देखूं
तेरे ही दर्शन मैं पाऊं
पत्तों में हरियाली बनकर
फूलों में कोमलता बनकर
पानी में निर्मलता बनकर
धूप में किरणों की धारा तुम
बदली में तुम वर्षा बनकर
जिधर भी देखूं
जहां भी देखूं
तेरे ही दर्शन मैं पाऊं .
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बिम्ब 
बिम्ब

एक आवाज़
मेरे भीतर से आती हुई
यह तो परिचित भी नहीं
इसके साथ
कोई मित्रता भी नहीं
एक भटके बादल का टुकड़ा सा
या किसी टूटते तारे की
एक ख़ौफनाक चीख
अंतर के सन्नाटे को
चीरती हुई
यादों के सागर से
आती हुई
तुम्हारी आवाज़
और तुम
मेरा बिम्ब
कभी परिचित लगती हो
और कभी अपरिचित.
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दुःख होता है  

(फलस्तीनी स्वतन्त्रता सेनानियों के नाम)

प्रात: कालीन सूर्य की
लालिमा को
कलि बदली अगर छिपाए
दुःख होता है  

आँखों पर प्रतिरोध लगा कर  
रात्र को भी दिन बतलाए
दुःख होता है  

पाप की काली चादर हर ओर  
फैले,दिनकर
देखता जाए
दुःख होता है  

मानव को
मानव अधिकार के बदले
स्वतन्त्रता के बदले
घाव मिले
गोली मिल जाए
दुःख होता है  

आशा,पुष्प और सत्य की क्यारी
हठधर्मी से रौंधी जाए
दुख होता है .

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मैं

मैं
जीवन की इस नदिया में
पत्थर सा पड़ा हूँ
हज़ार पत्थरों के संग 
हर पल हर दम
बहता हूँ
एक लम्बी यात्रा में रहता हूँ
कभी पानी की तीव्र धार
ले जाती है अपने संग
और कभी तट के साथ
पटक कर चली जाती है जलधार
अंतहीन इस पीड़ा यात्रा में
मैं अंश-अंश पिघल रहा हूँ
पानी में डूब कर  
रख रहा हूँ अपना पानी
और कर रहा हूँ निर्माण
अपने ही ‘मैं’ का .


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