Sunday, February 9, 2014


जिससे प्यार हो”*

जिससे प्यार हो
उसके साथ निकल जाना चाहिये ”*
सूर्योदय से पहले
बंकर-बस्ती से दूर
बहुत दूर
और पार करना कहिए
भावनाओं के दरिया पर बनाया गया
विश्वास का वह पुल
जिसको धर्म की दहलीज पर बैठे
देवतओं ने गिराये जाने का
दंड दिया हो
       *
जिससे प्यार हो
उसे हमेशा पुकारना चाहिये
एक छोटे से नाम से ”*
और उसके साथ रचनी चाहिये
एक सांझी कविता
अपने हाथों की रेखाओं को
देकर शब्दों का आकार
और खोजने चाहिये
आकाश पर
अपने भाग्य के तारे
अपनी इच्छा के ग्रह-पथ पर
डालने के लिए
        *
जिससे प्यार हो
उसे पूजना चाहिए
दुर्गापूजा के दिन
वरदान में माँगना चाहिए
आँखों का एक पूरा आकाश
और समेटना चाहिए
अपने दामन में
एक-एक दमकता तारा
प्यार का
         *
जिससे प्यार हो
उसके बालों में टांक देना चाहिए
वसंत में खिलने वाला
पहला फूल
और उसको मुनाना चाहिए
साँझ समय
पूर्णिमा की रात
शरीर की दहकती आग में उपजा
चनचल विचार
          *
जिससे प्यार हो
उसके साथ खरीदनी चाहिए
एक नेया
और एक महासागर
और निकलना चाहिए ढूँढने
डूबे हुए सत्य की लाश
किसी बर्फानी तोदे के सीने में
           *
जिससे प्यार हो
उसके साथ नाचना चाहिए
नंगे पांव
अमावस की रात
किसी दूर द्वीप में
तलवों के रक्तरंजित हिने तक
और देना चाहिए उसे उपहार
होंठों पर झिलमिलाता ,रस भरा
एक सलोना ,नमकीन चाँद .
* एक पाकिस्तानी कवि की दो पंक्तियाँ 
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प्रेम और घर्म

प्रेम का एक और रूप भी होता है  
भी के चेहरे  से उठा  देना नकाब
और मानवता  के बदले  अर्थ को
फिर से अपनी जगह पर ले आना
          *
घर्म का एक और रूप भी होता है  
झूठ के चेहरे से उठा देना  नकाब
और बचाकर  किसी के जीवन को
स्वयं मौटी के मुंह  में चले जाना .
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पत्थरों का शहर

तुम
आज भी मेरे पास हो
मेरे बहुत निकट
स्मृतियों में ढली हुई
वैसी ही गुम-सुम
अपने मुख पर
प्रश्नों का अम्बार लिए
प्यारे दिल का विस्तार लिए
मैंने सारे जग की मिटटी छानी
निकला ढूंढने उनके उत्तर
पर इस पत्थरों के शहर में
शीशे का कोई मोल कहाँ
मत रोओं ,बिखराओ मोती
देखों मैं निराश नहीं हूँ
इन कजरारे मस्त नयन का
आमन्त्रण स्वीकार मुझे
आओ
रच लें अपनी एक सुंदर सृष्टि
पुरातन यादों की मधुर छाया में
वह पेड़ शहर से दूर
अलग .

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घटाओं से परे

क्यों न इस समय
घटाओं से परे
नफरत और संकीर्णता के
क्षितिज से दूर
बहुत दूर
मानवता और केवल मानवता
के दीये जलाएं
खुले आकाश में रहकर
शत्रुता और भेद-भाव की
दीवारें गिराएं
अपनी प्रेम-फुहार से
जलते पल की
आग बुझाएं
सृष्टि के उजले तन से
गर्द की परत हटाएं
टूटे स्वप्न को जोड़ें
दीन-दु:खी को
प्रीत की गोद में सुलाएं
सारी मानवता को
उन रास्तों पर दल दें
जो शताब्दियों पर फैले हैं  
लल्लेश्वरी और नुन्द-ऋषि
के रस्ते पर
जिनके माथे पर
हर क्षण सत्य का सूर्य
चमकता है  
आओं , मानवता के शब्द को
उसको छीना हुआ वह रूप
वापिस दिलाएं
जो सूर्य की पहली किरण की तरह
सारे वातावरण को
चमकाता है  
आओं कि हमारा दर्द
केवक हमारा नहीं
तुम्हारे आंसू
केवल तुम्हारे नहीं
यह सारी मानवता का दर्द है  
यह हम सब का
साँझा दर्द है  .

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एक कविता

एक प्रतिबिम्ब
रात्रि के सन्नाटे में चीख़ 
किसी दुर्घटना की चेतना
मन-मन्दिर के दिए की लौ 
एक भूकम्प
गर्भवती के अन्तिम क्षण
मृत्युदण्ड पाने वाले की
अन्तिम इछा
या फिर एक कविता .
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नीलकंठ

जीवन का एक
सुंदर रूप भी होता है  
सरे संसार का विष पी लेना
और बन जाना
एक नीलकंठ
     *
जीवन का एक
सुंदर अर्थ भी होता है  
अमृत की तरह
दुःख-दर्द पी लेना
और बन जाना
एक मनुष्य .
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बदलते अर्थ

अंतर की खेती में
बोए थे बीज
भाव-पुष्पों के
किन्तु
उनहोंने अपने अर्थ
बदल दिए
और कांटे बनकर
उगने लगे
चुभने लगे
    *
अपने मन-मन्दिर में
जलाए थे कुछ दीप
कि प्रकाश दे देंगे
इस तमस-ग्रस्त चित को
किन्तु
उनहोंने अपने अर्थ बदल दिए
और राख कर दिया
मेरे तन और मन को
      *
उम्मीद की इक डोर बंधी थी
कि बचा लेगी गिरने से
किन्तु
उसने भी अपना अर्थ बदल दिया
और फंसी का फंदा बनकर
मुझको झुला दिया .

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दिल की लहरें

मैं
अपने हृदय के तट पर
बहती धरा को देखता जाऊँ
ताकता जाऊँ
क़ुदरत की कविता को देखूँ
निर्मल-निर्मल जल को देखूँ
चित के इस दर्पण को देखूँ
लहर-लहर इक विस्तार लेकर
हर ओर
हर रुत एक उमंग है
हर धरे में एक तरंग है  
और इन
लहरों के काँधों पर
शायद तुम हो
आशाओं का चप्पू लेकर
भावनाओं की नैया लेकर
और इस सागर जल के निचे
लहरों के भीतर ही भीतर
दुःख और दर्द
दब सा गया है  
चुप सा गया है  
और मैं
इस झील के तट पर
लहरों के विस्तार को देखूँ
नैया और मंझधार को देखूँ
रोता जाऊं
नीर बहाऊं
मेरा अंग-अंग लोचन बन कर  
रोता जाए
इतने नीर बहाए
कि पलक झपकते ही
एक झील बन जाये
नीरों का .
                (मेरी पहली हिंदी कविता -1983 )

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मैं भगवान नहीं हूँ

तुम कहते हो
भूल जाओ इन दुखों को
किन्तु जब
हरे पत्तों के झुलसने का
दुःख हो
तीव्र आंधी में उजड़े नीड़ों के
बिखरने का दुःख हो
बुद्धदेव के शापित होने का
दुःख हो
विश्व-स्वर्ग के
बाढ़-ग्रस्त होने का
दुःख हो
बर्फीले हाथों में
आंवां भरने का
दुःख हो
तो मेरे मित्र
मैं किस-किस दुःख को भूलूँ
कि मैं भगवान नहीं हूँ
जो भूल जाऊं
मैं मनुष्य हूँ
जो कुछ भी नहीं भूलता .
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ओ मेरे शीशमन्दिर

कौन तुम पर
फैंक गया यह पत्थर
आह !
मेरे शीशमन्दिर
मुझे दू:ख है 
कि मैंने चढ़ाया था
एक स्मृति कलश
बिखर गया
सजाई थी
किसी के नाम की
एक प्रतिमां 
जो टूट गई
आशाओं का
इक नादघंट था
गिर्र गया
ही गया सब कुछ
असिथर !
कौन तुम पर
फैंक गया यह पत्थर
आह !
मेरे शीशमन्दिर.


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