Thursday, December 18, 2014
Monday, February 10, 2014
अक्षर-अक्षर रक्त-भरा
(कविताएँ)
प्रथम संस्करण :- 1997
____________________________________________
अपने नन्हें,मासूम बच्चों
नर्गिस,दीपू और आशु
के नाम
जो रात को दरवाज़े
पर दस्तक पते ही चौंक जाते हैं
और छिपा लेना
चाहते हैं मुझे अपनी नन्हीं पीठ के
पर्दे की ओट में. जिनकी
आँखों के दर्पण में ,मैं
कभी आतंकित
वर्तमान और कभी भविष्य के लिए
ढेर सारा
प्यार,एकता,शान्ति और मुस्कुराती मानवता
देखता हूँ
...और अपने सहमे हुए प्यार के नाम
_____________________
प्रौढ़ता का परिचय...
बहुत दिनों के बाद अच्छी कवताएँ पढ़ने
को मिलीं . निदा नवाज नाम देखकर मैंने सोचा कि यह युवक उर्दू-नुमा हिंदी लिखने की
कोशिश कर रहा है . मुझे मालूम है कि ऐसे ‘लेखक’ न इधर के रहते हैं ,न उधर के . इस
प्रदेश में हिंदी तो वैसे ही घाटे का सौदा है—सौदा क्योंकि आज का युग पूंजी का युग
हे और कविता मात्र विक्रय की वस्तु बन कर
बेहद डरी-डरी है .
निदा नवाज़ की पहली कविता जो मैंने पढ़ी वह
‘योजना’(मासिक-जम्मू) में प्रकाशित हो चुकी थी .कविता पड़ी तो मेरी धारणा बदली—एकदम
. एक सुखद आश्चर्य से मैं कविता ‘चेतना
सरोवर के तट पर’ पढ़ता चला गया .युवा मानसिकता किस तरह मोहभंग से ग्रस्त है , इसकी सुन्दर और सशक्त अभिव्यक्ति इस कविता में
हुई है .कविता की आरम्भिक पंक्तियों ने ही मुझे भाव और विचार के मिश्रित ‘आलोक’
में पहुंचा दिया.’सांझ की लालिमा’ परम्परा से रोमांटिक अनुभूति की द्योतक रही है ,थोड़ा
और आगे बढ़ें तो साम्यवादी क्रान्ति से जुड़ने लगता है यह प्रतीक . लेकिन निदा के यहाँ यह प्रयोंग
नितांत मौलिक है .
मैं पूछता हूँ/सांझ की लालिमा से/क्या रक्त उसी रंग का नाम
है /जो हमारे हर शब्द का स्वभाव/हर कविता का अभ्मान...(और आगे की पंक्ति पूरी तरह
एक मोड़ ले लेती है -) और हर पुस्तक का शीर्षक/ठहर गया ?
बिम्ब की रक्षा करता हुआ कवि अर्थ का व्यतिरेक
प्रस्तुत करने में पारंगत है –में पूछता हूँ/आकाश में तैरते सूर्य से/क्या न्याय उसी का
नाम है /कि मनुष्य हर पल/सौ बार मरे/और फिर भी उस पर/जीवित होने का/कडुवा आरोप
लगे.
‘मरना’ जीने का पर्याय बन जाए---एक सामान्य
अनुभूतिजनित तथ्य है .लेकिन कवि इस अनुभूति से आगे निकलकर हमें बताता है कि
बार-बार मर कर यह ‘जीना’ मात्र एक ‘आरोप’—जीवित होने का कडवा आरोप बन कर रह गया है
.कवि की अनुभूति का एक स्तर वह है जहां वह मर कर भी जीवित होने का आरोप सहने को बाध्य
है और इसी में निमज्जित दूसरा स्तर वह है जो कवि की छटपटाहट व्यक्त करता है मानो वह पुकार-पुकार कर कहता है—नहीं,मुझ पर जीवित होने का आरोप मट
लगाओ.
कवि रोमांटिक क्षणों को भी भोगता है लेकिन
वातावरण में भरा ज़हर उसे बार-बार इस अनुभूति से बाहर घसीट लाता है .यह दर्दनाक
सिथ्ति न तो रोमांटिक रह पाती है ,न किसी से कर्ज़ ली गई है . यह मात्र सच है .जिन्दगी का सच;वस्तुत:यही
जिन्दगी है,यह ‘सच’ जिन्दगी से अलग नहीं है . यहाँ एक चाह शेष रहती है –एक स्वप्न
देखने की—
कि उस/दोपहर की रुपहली धूप को/केवल एक बार मैं/फिर से देखूं/हड्डियों के पिंजरे से निकलूं/आकाशों में
उड़ जाऊं .
रोमांटिक क्षणों का निरंतर बढ़ता अभाव कवि को
कचोटता नहीं.कवि की अनुभूति इस स्थिति को बहुत पीछे छोड़ आई है . अब यह अनुभूति
इतनी सहज और सामान्य हो गई है कि कवि को ऐसे शब्दों की ज़रूरत नहीं रही जिनसे वह
दूसरों को चौंका सके.घर का मोह कवि की अन्तश्चेतना में गहरे धंसा है . लेकिन अभिव्यक्ति का ठंडापन कवि की प्रौढ़ता का परिचय
देता है .
तुम साक्षी रहना /वितस्ता/कि मेरी बेटियाँ
/जिनके चेहरों से /यहाँ के सेब/रंग चुराया करते थे/(.....)बारूदी धुएं में/ काली
पड़ गई हैं .
निदा नवाज़ की कविताएँ एक विस्थापित व्यक्ति
के ऐसे उदगार नहीं हैं जो अपने घर-बिछुड़े
हुए घर को,बाहर खड़ा देख रहा है . कवि अपने आपको युद्ध और मौत के ऍन बीच पाता हे –इस उलझन में हूँ / कि इन लाशों में/मेरी कौन सी लाश है ?
याद रखना होगा कि कवि अपनी सांस्कृतिक जड़ों
को छोड़ या तोड़ नहीं पाता .उसकी आस्था ‘आषाढ़ का एक दिन’की मल्लिका की आस्था से कहीं
अधिक सशक्त और विराट हे.मल्लिका एक सशक्त प्रतीक होने के बावजूद एक व्यक्ति है और
निदा नवाज़ का कवि एक व्यक्ति होकर भी एक समष्टि है. इतिहास और वर्तमान ,दोनों को
एक साथ आत्मसात करने वाला इयत्ता.
हमारे हाथों से हर समय /श्रद्धा की घंटियां बजती हैं /और
हमारे इतिहास में ...मधुर श्लोकों की मधु धारा बहती है /....विचार का हर बिंदु /और
श्रद्धा भरे सभी श्लोक रक्त-रंजित हो गए.
एक सांझी विरासत को सुरक्षित रखने का इरादा
बहुत पक्का है उसके पास. इस इरादे को नहीं
तोड़ पाएगा कोई मज़हबी जनून.क्योंकि कविता हमें इन सारी स्थितियों से पार और परे ले
जाती है –इतिहास को पुराण बन्नने की क्षमता है उसके पास आज के युग में भी ----जिससे प्यार हो/उसके साथ नाचना चाहिए /नंगे पाँव /अमावस की
रात/किसी दूर द्वीप में/तलवीन के रक्तरंजित होने तक....
कवि
के शिल्प में कहीं-कहीं झोल आ गई है . कुछ
प्रयोगों में ‘एक’के स्थान पर ‘इक’ का प्रयोग अनावश्यक दीखता है .’मधुर श्लोकों की
मधुधारा’ में मधु अनावश्यक नहीं लगता क्या ?
नि:संदेह
, निदा नवाज़ के पास कविता है –अनुभूतियाँ जो स्वत: शब्द बनके निकलती हैं .ऐसे कवि
के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं .
प्रो.ओमप्रकाश गुप्त
(अध्यक्ष,हिंद विभाग
,जम्मू
विश्वविद्यालय
_______________________________________
निदा नवाज़ की ये कविताएँ ...
अच्छी किताब को किसी ‘भूमिका’ की बैसखी की अपेक्षा नहीं
होती.लेकिन अच्छी किताब को भी सुधी,सहृदय पाठक की अपेक्षा ज़रुर होती है .
पिछले 9-10 बरस से सहमी हुई कश्मीर की सर्वगोदम वादी
में ,उसकी हज़ारों बरस पुरानी सांस्कृतिक परम्पराएं अपने घावों पर मरहम लगाने वाले
ममता-भरे हाथों की प्रतीक्षा में हैं .ऐसे लगने लगा है कि वादी की यह मौन प्रतीक्षा
अब समाप्त होने पर आई है .
क्या यह सुखद
आश्चर्य नहीं है कि वहां के इस काले दौर में भी साहित्य और संस्कृति के दीप
अंधेरों से पराजित नहीं .
कश्मीर के युवा
कवि निदा नवाज़ का यह कविता-संग्रह इसी तरह का एक दीप है .इस संग्रह में निदा नवाज़
की लगभग 13-14 बरस की साधना संकलित है .निदा नवाज की इस साधना की विशेष
बात यह है कि उस ने वादी में दहशत तथा वहशत के दौर में भी ,वादी में रहकर ही अपनी इस
काव्य-साधना को परवान चढ़ाया है .निदा नवाज़ अपनी इस साधना में वहां अकेले होकर भी
अकेले नहीं./कुछ कमी नहीं है /सब कुछ
है अब / पास मेरे.../ अधखिले फूल / भावनाओं की नदियाँ / आंसुओं की वर्षा....
निदा नवाज़ अपनी
ही आस्था और विशवास से प्रेरित होकर इस समय अकेला ही हिंदी कविता की मशाल लेकर
अँधेरे रस्ते में निकल पड़ा है .निदा नवाज़
का दर्द और उसकी आस्था के कुछ अंकुरों के नमूने देखिये. /आशा,पुष्प और सत्य की क्यारी/हठधर्मी से रौन्धी जाए/दुःख
होता हे/..........सिरहाने रखे सपने/सांप बन जाते हे,/जब बारूदी धुएं
में/पूर्णिमा/आमावस बन जाती हे.......आओ आज इस धरती पर/शान्ति की एक चादर बिछाएं
/और यह प्रतिष्ठित करें/किसारी मानवता की सफलता/केवल शान्ति में हे.
निदा नवाज़ मैं तुम्हारे लिए यही प्रार्थना करता हूँ
‘शुभास्ते सन्तु’—तुम्हारे इस सफ़र की रहें बाधा-रहित हों.
३४,कर्ण
नगर
प्रो.रामनाथ शास्त्री
(जम्मू) (पदमश्री)
_________________________________________
दो शब्द
हम
ने शब्दों को अर्थ दिये
हम
सरगोशियों और
मुस्कुराहटों
की भाषा जानते हैं
हम
में जीवन की आत्मा में
झाँकने
का मनोबल है
हमारे
चेतना की डलझील हो
या
हमारे विचारों की वितस्ता
हर
जगह सपनों के अनमोल मोती
पानी
की स्थ पर
थिरकते
हैं
हमारे
हाथों से हर समय
श्रद्धा
की घंटियां बजती हैं
और
हमारे इतिहास में
एकता,प्यार
और मानवता के
मधुर
श्लोकों की
मधुधारा
बहती है
हमारे
संसार में
कहीं
नहीं होती है
निष्फल
प्रतीक्षा और
टूटे
सपनों की बातें
हमारी
धरती के पर्वतीय सरोवर में
शेर
और बकरी एक साथ
पानी
पिते हैं
समय
बिता जा रहा है
और कहीं से काले बदल के
आदमखोर
टुकड़े ने
धूप
की धरती को
अपनी
चपेट में ले लिया
शहर
में दहकते पत्थरों की
वर्षा
हुई
सपनों
के आकाश में
चांदनी
बुझ गई
और
अमावस की रात
एक
प्रश्न-चिन्ह बनकर
रूहों
में बहुत सरे रेगिस्तान
बिछा
गई
अपमानित
हो गया हमारा इतिहास
हमारी
शताब्दियों तक फैली
पूरी
पहचान बिखर गई
चेत्तना
की डलझील
और
विचार की वितस्ता का
सारा
पानी
बूंद-बूंद
रक्त हुआ
हमारे
विवेक धरातल पर
कंटीली
झाड़ियाँ उग आईं
डर
और पीड़ा
हमारे
अंतरमन में
समा
गई
और
हमारे सपनों के आंगन में भी
बंकर-बस्तियां
बनने लगीं
विश्वास का हर प्रकाश बिंदु
और
श्रद्धा भरे सभी शलोक
रक्तरंजित
हो गये
अब
हमारे पास
अर्पण
करनी को कुछ न बचा
केवल
रुपहली
धूप की टूटी आशा
और
ये घायल मन के बिखरे टुकड़े
मेरी
कविताएँ
जिनको
थरथराते हाथों से
रख
रहा हूँ आपके हाथों में
इन
कविताओं के हर शब्द का है
अक्षर-अक्षर
रक्त-भरा .
22 नवम्बर ,1997 निदा
नवा़ज़
(कश्मीर)
______________________________________
चेतना-सरोवर के तट पर
मैं पूछता हूँ
सांझ की लालिमा से
क्या रक्त उसी रंग का नाम है
जो हमारे हर शब्द का स्वभाव
हर कविता का अभिमान
और हर पुस्तक का शीर्षक
ठहर गया ?
*
मैं पूछता हूँ
घनघोर घटाओं से
क्या वर्ष उसी जल का नाम है
जो आंसुओं की नदियाँ बनकर
बहा लेजाती है आँखों से
सपनों के साथ-साथ
आदर भी ?
*
*“मैं
पूछता हूँ
आकाश में उड़ते सूर्य से”
क्या न्याय यसी सत्य का नाम है
कि मनुष्य हर पल
सौ बार मरे
और फिर भी उस पर
जीवित होने का
कडुवा आरोप लगे ?
*
मैं पूछता हूँ
पूर्णिमा के चंचल चाँद से
क्या प्रेम उसकी शक्ति का नाम है
जो विश्वास के माथे पर
संदेह बनकर
लक्ष्मण-रेखा खिंचवाए
और अग्नि-परीक्षा ले ?
*
मैं पूछता हूँ
इतिहास के पन्नों पर बिखरे
कठोर शब्दों से
क्या अनुभव उसी प्रकाश का नाम है
जो घटनाओं की उस नागिन की
मस्त आँखों से फूट कर वशीभूत करता है
जो डस लेती है
शरीर के साथ साथ
आत्मा को भी ?
*
मैं पूछता हूँ
प्रात:कालीन पवन की
शर्मीली आहट से
_________________________________________________
क्या वायु उसी आंधी का नाम है
जो हर बार मेरे
उस चेतना-सरोवर से गुज़रती है
जहां से उभरने वाले
सभी प्रश्नों के सूर्य
घायल होकर दबे पांव
मेरे ही अवचेतना-सागर में
डूब जाते है ?
*
प्रश्न करते करते
मैं
थके हुए घोड़े की तरह
हांफ जाता हूँ
और अपने ही
चेतना-सरोवर के तट पर
बैठे बैठे मर जाता हूँ.
*पाश की एक कविता की दो पंक्तियाँ
___________________________________________________
बाँझ धरती
बाँझ धरती नें
अधजले बीज
हम ही ने बोए थे
और अब हम ही
भरी उपज की प्रतीक्षा में
भूखे मर रहे हें .
हत्या का अहसास
कभी मेरी बस्ती के लोगों को
आकाश में सुर्खी देख क्र
किसी जगह हुई हत्या का
अहसास होता था
और अब
आकाश की सारी सुर्खी
मेरे शहर पर चा गई हे
और मेरी बस्ती के लोगों को
किसी हत्या का
कोई अहसास नहीं.
_________________________________________
मेरी बस्ती में
मेरी बस्ती में
आज भी हैं
वे बड़ी-बड़ी कोठियां
लोहे और सीमेंट से बनी
खिडकियों पर आकाशी रंग के पर्दे
मेरी बस्ती में
आज भी हैं
वे छोटी-छोटी झोंपड़ियाँ
उन से आ रही खांसने की आवाज़ें
कुछ जिन्दा लाशों की
जिनका सर्वस्त
केवल दो रोटियाँ
और मैली-कुचली लंगोटियां
इन झोंपड़ियों की कभी कोई
मर्यादा नहीं रही है
इन का सब कुछ रहा है
कोठियों के लिए
किन्तु
उनका खून,उनका पसीना
एक प्रश्न बनकर
उभर आया है
उस लोहे और सीमेंट पर
और उस प्रश्न को
वे रेशमी आकाशी रंग के पर्दे भी
रोक नहीं सकते
वे उपरी मंजि़ल पर लटकी
नील रंग की तख्ती भी नहीं
जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा है
*‘हाज़ा मं फज़ले रब्बी’
(*यह सब प्रभु की ही कृपा हे)
______________________________________________
वितस्ता तुम साक्षी र
वितस्ता तुम साक्षी रहना
कि मेरी आँखों का
काजल
और होंठों की
लाली
तुम्हारे जल के साथ
बह गई .
मेरी छाती पर उगे
चिनार के वृक्ष
जो थके यात्रियों को
थोड़ी देर
अपनी छाया में रखकर
आगे बढ़ने की
प्रेरणा देते थे
जड़ से उखाड़ दिये गये .
मेरे सन्तान के सिर
भरी उपज की भांति
काट दिये गये .
तुम साक्षी रहना
वितस्ता
कि मेरी बेटियाँ
जिनके चहरों से
यहाँ के सेब
रंग चुराया करते थे
बारूदी धुएं में
काली पड़ गई हैं .
और तुम्हारी छाती पर
थिरकती कश्तियाँ
नए-नवेले जोड़ों की
सरगोशियाँ सुनने को
व्याकुल हैं .
तुम साक्षी रहना
कि तुम्हारा निर्मल जल
जो कभी
“हारी-पर्वत” के साथ साथ
शन्कराचार्य के मन्दिर को भी
प्रतिबिम्बित कर देता था
बूंद बूंद रक्त हुआ है .
वितस्ता
तुम इस बात की भी
साक्षी रहना
कि अजनबियों के
भारी बूटों तले
विकृत होकर
मैं
तुम्हारी जननी
धायल घाटी
अपना परिचय खो बैठी ..
_______________________________________________
कल्पना की दहलीज़ पर
मैं जब भी वहाँ जाता हूँ
उसी कोने वाली मेज के
एक तरफ़ बैठता हूँ
और ताकता हूँ
अपने सामने की खाली कुर्सी को
जिस पर कभी
तुम बैठती थी
ज़ाफ़रानी यादों की कलियाँ
खिल उठती हैं
कल्पना की दहलीज़ पर
तुम्हारे पाँव की आहट
सुनाई देती है
मेरे सामने तुम्हारी
दो ज़मुर्दी आँखें
उभरती हैं
मैं उनके इन्द्रजाल में
खो जाता हूँ
धीरे-धीरे तुम्हारा
पूजा की रूपहली थाली-जेसा
चेहरा उभरता है
और माथे का तिलक
जैसे आरती का दीया
तुम अपना हाथ
मेरे हाथ पर रखती हो
लोहे को छूता हे पारस
“हरमुख-पहाड़ी” से
पार्वती का आशीर्वाद लिए
कोई हवा का झोंका आकर
कमल की दो पत्तियों को
छेड़ता है
और तुम्हारे दो कोमल होंठों से
सरगोशियाँ फूटती हैं
बातों-बातों में
तुम रूठ जाती हो
कल्पना की दहलीज़ पर
मैं तुम्हारे जाने की
आहट सुनता हूँ
मैं चौंक जाता हूँ
अपने सामने की
खाली कुर्सी को ताकता हूँ
आँखों के आकाश से
आँसू के तारे
टप...टप...गिरते हैं
और में
मेज़ पर बिखरी
हर बूंद के दर्पण में
अकेला रहता हूँ
एकांत.
_______________________________________
जीवन झांकता
जीवन बुझे हुए
चेहरे की पॉवडर-तले छुपी
हर उस झुर्री में से झांकता हे
जो ग्राहक के निकलते ही
पछतावे और मजबूरी की पीड़ा से
और गहरी हो जाती हे.
*
जीवन पसीने की हर उस
पवित्र बूंद में से झांकता हे
जो एक अपमानित मजदूर के माथे से
रोटी और पेट के बीच की
थका देने वाली दूरी
काटते गुए गिरती हे.
*
जीवन कलम से टपकने वाले
हर उस कठोर शब्द में से झांकता हे
जो मेरे आदिमख़ोर शहर में
अपनी घायल पीठ पर
घटनाओं-भरे इतिहास को
बंधुआ मजदूर की तरह उठाता हे .
*
जीवन मेरी कविताओं की
हर उस सिमटी हुई पंक्ति
में से झांकता हे
जो गोलियों की वर्षा में बैठे
डर और खौफ से
बीच में ही काट डी जाती हे .
*
जीवन समय की सूली पर चढ़े
हर उस व्याकुल पल में से झांकता हे
जब कविता के बीच में ही
विचार का चंचल पंछी उड़ क्र
अन्तरिक्ष के शून्य में
खो जाता हे .
*
जीवन हमारे दिलों ही हर उस
बेतरतीब धड़कन में से झांकता हे
जो रात के समय
अजनबी क़दमों की आहट सुनकर
दरवाजे की कुण्डी चढाते हुए
गूंज उठती हे .
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