Monday, February 10, 2014


निदा नवाज़ की ये कविताएँ ...

अच्छी किताब को किसी ‘भूमिका’ की बैसखी की अपेक्षा नहीं होती.लेकिन अच्छी किताब को भी सुधी,सहृदय पाठक की अपेक्षा ज़रुर होती है .
   पिछले 9-10 बरस से सहमी हुई कश्मीर की सर्वगोदम वादी में ,उसकी हज़ारों बरस पुरानी सांस्कृतिक परम्पराएं अपने घावों पर मरहम लगाने वाले ममता-भरे हाथों की प्रतीक्षा में हैं .ऐसे लगने लगा है कि वादी की यह मौन प्रतीक्षा अब समाप्त होने पर आई है .
    क्या यह सुखद आश्चर्य नहीं है कि वहां के इस काले दौर में भी साहित्य और संस्कृति के दीप अंधेरों से पराजित नहीं .
    कश्मीर के युवा कवि निदा नवाज़ का यह कविता-संग्रह इसी तरह का एक दीप है .इस संग्रह में निदा नवाज़ की लगभग 13-14 बरस की साधना संकलित है .निदा नवाज की इस साधना की विशेष बात यह है कि उस ने वादी में दहशत तथा वहशत के दौर में भी ,वादी में रहकर ही अपनी इस काव्य-साधना को परवान चढ़ाया है .निदा नवाज़ अपनी इस साधना में वहां अकेले होकर भी अकेले नहीं./कुछ कमी नहीं है /सब कुछ है अब / पास मेरे.../ अधखिले फूल / भावनाओं की नदियाँ / आंसुओं की वर्षा....
     निदा नवाज़ अपनी ही आस्था और विशवास से प्रेरित होकर इस समय अकेला ही हिंदी कविता की मशाल लेकर अँधेरे रस्ते में निकल पड़ा है  .निदा नवाज़ का दर्द और उसकी आस्था के कुछ अंकुरों के नमूने देखिये. /आशा,पुष्प और सत्य की क्यारी/हठधर्मी से रौन्धी जाए/दुःख होता हे/..........सिरहाने रखे सपने/सांप बन जाते हे,/जब बारूदी धुएं में/पूर्णिमा/आमावस बन जाती हे.......आओ आज इस धरती पर/शान्ति की एक चादर बिछाएं /और यह प्रतिष्ठित करें/किसारी मानवता की सफलता/केवल शान्ति में हे.
                   
        निदा नवाज़ मैं तुम्हारे लिए यही प्रार्थना करता हूँ ‘शुभास्ते सन्तु’—तुम्हारे इस सफ़र की रहें बाधा-रहित हों.
  
३४,कर्ण नगर                            प्रो.रामनाथ शास्त्री
 (जम्मू)                                   (पदमश्री)


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 दो शब्द

हम ने शब्दों को अर्थ दिये
हम सरगोशियों और
मुस्कुराहटों की भाषा जानते हैं
हम में जीवन की आत्मा में
झाँकने का मनोबल है
हमारे चेतना की डलझील हो
या हमारे विचारों की वितस्ता
हर जगह सपनों के अनमोल मोती
पानी की स्थ पर
थिरकते हैं  
हमारे हाथों से हर समय
श्रद्धा की घंटियां बजती हैं  
और हमारे इतिहास में
एकता,प्यार और मानवता के
मधुर श्लोकों की
मधुधारा बहती है  
हमारे संसार में
कहीं नहीं होती है
निष्फल प्रतीक्षा और
टूटे सपनों की बातें
हमारी धरती के पर्वतीय सरोवर में
शेर और बकरी एक साथ
पानी पिते हैं  
  
  समय बिता जा रहा है

     और कहीं से काले बदल के
आदमखोर टुकड़े ने
धूप की धरती को
अपनी चपेट में ले लिया
शहर में दहकते पत्थरों की
वर्षा हुई
सपनों के आकाश में
चांदनी बुझ गई
और अमावस की रात
एक प्रश्न-चिन्ह बनकर
रूहों में बहुत सरे रेगिस्तान
बिछा गई
अपमानित हो गया हमारा इतिहास
हमारी शताब्दियों तक फैली
पूरी पहचान बिखर गई
चेत्तना की डलझील
और विचार की वितस्ता का
सारा पानी
बूंद-बूंद रक्त हुआ
हमारे विवेक धरातल पर
कंटीली झाड़ियाँ उग आईं
डर और पीड़ा
हमारे अंतरमन में
समा गई
और हमारे सपनों के आंगन में भी
  बंकर-बस्तियां बनने लगीं
     विश्वास का हर प्रकाश बिंदु
और श्रद्धा भरे सभी शलोक
रक्तरंजित हो गये
  अब हमारे पास
अर्पण करनी को कुछ न बचा
केवल
रुपहली धूप की टूटी आशा
और ये घायल मन के बिखरे टुकड़े
मेरी कविताएँ
जिनको थरथराते हाथों से
रख रहा हूँ आपके हाथों में
इन कविताओं के हर शब्द का है
अक्षर-अक्षर रक्त-भरा .



22 नवम्बर ,1997                                        निदा नवा़ज़
                                              (कश्मीर)   

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चेतना-सरोवर के तट पर
 
मैं पूछता हूँ 
सांझ की लालिमा से
क्या रक्त उसी रंग का नाम है  
जो हमारे हर शब्द का स्वभाव
हर कविता का अभिमान
और हर पुस्तक का शीर्षक
ठहर गया ?
    *
मैं पूछता हूँ 
घनघोर घटाओं से
क्या वर्ष उसी जल का नाम है
जो आंसुओं की नदियाँ बनकर
बहा लेजाती है आँखों से
सपनों के साथ-साथ
आदर भी ?
    *
*“मैं पूछता हूँ 
आकाश में उड़ते सूर्य से
क्या न्याय यसी सत्य का नाम है  
कि मनुष्य हर पल
सौ बार मरे
और फिर भी उस पर
जीवित होने का
कडुवा आरोप लगे ?
                            
    *

मैं पूछता हूँ 
पूर्णिमा के चंचल चाँद से
क्या प्रेम उसकी शक्ति का नाम है  
जो विश्वास के माथे पर
संदेह बनकर
लक्ष्मण-रेखा खिंचवाए
और अग्नि-परीक्षा ले ?
    *
मैं पूछता हूँ 
इतिहास के पन्नों पर बिखरे
कठोर शब्दों से
क्या अनुभव उसी प्रकाश का नाम है  
जो घटनाओं की उस नागिन की
मस्त आँखों से फूट कर वशीभूत करता है
जो डस लेती है
शरीर के साथ साथ
आत्मा को भी ?
    *
मैं पूछता हूँ 
प्रात:कालीन पवन की
शर्मीली आहट से
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क्या वायु उसी आंधी का नाम है  
जो हर बार मेरे
उस चेतना-सरोवर से गुज़रती है  
जहां से उभरने वाले
सभी प्रश्नों के सूर्य
घायल होकर दबे पांव
मेरे ही अवचेतना-सागर में
डूब जाते है ?
    *
प्रश्न करते करते
मैं
थके हुए घोड़े की तरह
हांफ जाता हूँ
और अपने ही
चेतना-सरोवर के तट पर
बैठे बैठे मर जाता हूँ.
*पाश की एक कविता की दो पंक्तियाँ
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बाँझ धरती

बाँझ धरती नें
अधजले बीज
हम ही ने बोए थे
और अब हम ही
भरी उपज की प्रतीक्षा में
भूखे मर रहे हें .
हत्या का अहसास
कभी मेरी बस्ती के लोगों को
आकाश में सुर्खी देख क्र
किसी जगह हुई हत्या का
अहसास होता था
और अब
आकाश की सारी सुर्खी
मेरे शहर पर चा गई हे
और मेरी बस्ती के लोगों को
किसी हत्या का
कोई अहसास नहीं.
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मेरी बस्ती में

मेरी बस्ती में
आज भी हैं
वे बड़ी-बड़ी कोठियां
लोहे और सीमेंट से बनी
खिडकियों पर आकाशी रंग के पर्दे

मेरी बस्ती में
आज भी हैं
वे छोटी-छोटी झोंपड़ियाँ
उन से आ रही खांसने की आवाज़ें
कुछ जिन्दा लाशों की
जिनका सर्वस्त
केवल दो रोटियाँ
और मैली-कुचली लंगोटियां
इन झोंपड़ियों की कभी कोई
मर्यादा नहीं रही है  
इन का सब कुछ रहा है  
कोठियों के लिए
किन्तु
उनका खून,उनका पसीना
एक प्रश्न बनकर
उभर आया है  
उस लोहे और सीमेंट पर
और उस प्रश्न को
वे रेशमी आकाशी रंग के पर्दे भी
रोक नहीं सकते
वे उपरी मंजि़ल पर लटकी
नील रंग की तख्ती भी नहीं
जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा है  
*‘हाज़ा मं फज़ले रब्बी’
(*यह सब प्रभु की ही कृपा हे)
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वितस्ता तुम साक्षी र

वितस्ता तुम साक्षी रहना
कि मेरी आँखों का
काजल
और होंठों की
लाली
तुम्हारे जल के साथ
बह गई .
मेरी छाती पर उगे
चिनार के वृक्ष
जो थके यात्रियों को
थोड़ी देर
अपनी छाया में रखकर
आगे बढ़ने की
प्रेरणा देते थे
जड़ से उखाड़ दिये गये .
मेरे सन्तान के सिर
भरी उपज की भांति
काट दिये गये .
तुम साक्षी रहना
वितस्ता
कि मेरी बेटियाँ
जिनके चहरों से
यहाँ के सेब
रंग चुराया करते थे
बारूदी धुएं में
काली पड़ गई हैं .
और तुम्हारी छाती पर
थिरकती कश्तियाँ
नए-नवेले जोड़ों की
सरगोशियाँ सुनने को
व्याकुल हैं .
तुम साक्षी रहना
कि तुम्हारा निर्मल जल
जो कभी
हारी-पर्वत के साथ साथ
शन्कराचार्य के मन्दिर को भी
प्रतिबिम्बित कर देता था
बूंद बूंद रक्त हुआ है .
वितस्ता
तुम इस बात की भी
साक्षी रहना
कि अजनबियों के
भारी बूटों तले
विकृत होकर
मैं
तुम्हारी जननी
धायल घाटी
अपना परिचय खो बैठी ..
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कल्पना की दहलीज़ पर

मैं जब भी वहाँ जाता हूँ
उसी कोने वाली मेज के
एक तरफ़ बैठता हूँ
और ताकता हूँ
अपने सामने की खाली कुर्सी को
जिस पर कभी
तुम बैठती थी
ज़ाफ़रानी यादों की कलियाँ
खिल उठती हैं
कल्पना की दहलीज़ पर
तुम्हारे पाँव की आहट
सुनाई देती है 
मेरे सामने तुम्हारी
दो ज़मुर्दी आँखें
उभरती हैं
मैं उनके इन्द्रजाल में
खो जाता हूँ
धीरे-धीरे तुम्हारा
पूजा की रूपहली थाली-जेसा
चेहरा उभरता है
और माथे का तिलक
जैसे आरती का दीया
तुम अपना हाथ
मेरे हाथ पर रखती हो
लोहे को छूता हे पारस 
हरमुख-पहाड़ी से
पार्वती का आशीर्वाद लिए
कोई हवा का झोंका आकर
कमल की दो पत्तियों को
छेड़ता है
और तुम्हारे दो कोमल होंठों से
सरगोशियाँ फूटती हैं
बातों-बातों में
तुम रूठ जाती हो
कल्पना की दहलीज़ पर
मैं तुम्हारे जाने की
आहट सुनता हूँ
मैं चौंक जाता हूँ
अपने सामने की
खाली कुर्सी को ताकता हूँ
आँखों के आकाश से
आँसू के तारे
टप...टप...गिरते हैं
और में
मेज़ पर बिखरी
हर बूंद के दर्पण में
अकेला रहता हूँ
एकांत.     
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जीवन झांकता 

जीवन बुझे हुए
चेहरे की पॉवडर-तले छुपी
हर उस झुर्री में से झांकता हे
जो ग्राहक के निकलते ही
पछतावे और मजबूरी की पीड़ा से
और गहरी हो जाती हे.
      *
जीवन पसीने की हर उस
पवित्र बूंद में से झांकता हे
जो एक अपमानित मजदूर के माथे से
रोटी और पेट के बीच की
थका देने वाली दूरी
काटते गुए गिरती हे.
       *
जीवन कलम से टपकने वाले
हर उस कठोर शब्द में से झांकता हे
जो मेरे आदिमख़ोर शहर में
अपनी घायल पीठ पर
घटनाओं-भरे इतिहास को
बंधुआ मजदूर की तरह उठाता हे .
        *
जीवन मेरी कविताओं की
हर उस सिमटी हुई पंक्ति
में से झांकता हे
जो गोलियों की वर्षा में बैठे
डर और खौफ से
बीच में ही काट डी जाती हे .
        *
जीवन समय की सूली पर चढ़े
हर उस व्याकुल पल में से झांकता हे
जब कविता के बीच में ही
विचार का चंचल पंछी उड़ क्र
अन्तरिक्ष के शून्य में
खो जाता हे .
         *
जीवन हमारे दिलों ही हर उस
बेतरतीब धड़कन में से झांकता हे
जो रात के समय
अजनबी क़दमों की आहट सुनकर
दरवाजे की कुण्डी चढाते हुए
गूंज उठती हे .


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2 comments:

  1. सर, कश्मीर को दूर से सुनता था। सिसकियां लेता स्वर्ग पढ़ रहा हूँ। इसके जरिये देख पाता हूँ वहां के हालात को। आपकी कवितायें भी बहुत अच्छी लगी। आप का शुक्रिया। वादियों की जमीनी हकीकत के मुज़्तर को साहित्य के ज़रिये राफ्ता करने का मौका दिया।

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  2. सर, कश्मीर को दूर से सुनता था। सिसकियां लेता स्वर्ग पढ़ रहा हूँ। इसके जरिये देख पाता हूँ वहां के हालात को। आपकी कवितायें भी बहुत अच्छी लगी। आप का शुक्रिया। वादियों की जमीनी हकीकत के मुज़्तर को साहित्य के ज़रिये राफ्ता करने का मौका दिया।

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