दिल,दिलबर,दिलदार की भाषा
हिंदी हो जन -जन की भाषा
तेरी
मेरी यह अभिलाषा
प्यार की भाषा यार की भाषा
दिल,दिलबर,दिलदार की भाषा
इस
भाषा को फैलाएगे
दूर
दूर तक पहुँचाएँगे
इसकी
सीमा उत्तर -दक्षिण
इसकी
बाँहें पूर्व् - पश्चिम
भेद
से ,भय से ऊपर हे यह
आर्यवर्त
का सूत्र हे यह
अक्षर
अक्षर अमृत प्याला
शब्दों
का हे रूप
निराला
सागर
सागर जेसे पानी
आकाशों
में इसकी वाणी
संत कबीर के दोहों वाली कर
जायसी
के शब्दों की पाली
सूरदास
का दर्पण है यह
मीरा का भी
चिनतन है यह
आओ इसको दिल से लगाकर
नमन
करेंगे शीष झुकाकर
_____________________________________________________________
आत्मा में बसा मरुस्थल
आज मुझे छुपा लो
अपने पोर-पोर में
मुझे समेट लो
आज मैं डर गया हूँ
बिखर गया हूँ
कि आखिर कब तक
सत्य न बोलने की पीड़ा को
चाय के कडुवे घूंट
के साथ बांधे रहूँ
अपनी दम-घुटती आकांक्षाओं
बिखरी आहों
जवान चेहरे पर
उभरी झुर्रियों
और आत्मा में बसे
मरुस्थल पर
फीकी हंसी की चादर ओढूं
अब में यह सब झेलते-झेलते
एक पत्थर बन गया हूँ.
_______________________________________________________________
सीमा हो तो नीलगगन की
आओ
आज इस विशाल धरती पर
शान्ति की एक चादर बिछाएं
और यह प्रतिष्ठित करें
कि सारी मानवता की सफलता
केवल शान्ति में है .
आओ कि
प्रकृति के इस मोहक चित्र से
आक्रोश की परत उठाएं
आओं
मारा-मरी अब बन्द करें हम
संकीर्णता से न डरें हम
भेद-भाव की ज़िद हम छोड़ें
मानवता से मुंह न मोड़ें
और धरती से
विकट विनाश की छाया हटाएं
शान्ति के ही गीत गाएं
और आज
इस धरती पर खिंची गई
सारी आबड-खाबड़ सीमाएं
मिटाएं
और फिर
सीमा हो तो नीलगगन की
भूख प्यास मिट जाए जग की
जीने को हर प्राण अकेला
हो फिर आतुर.
________________________________________________________
काले बादल का टुकड़ा
दोपहर की रूपहली धूप को
जाते हुए मैंने भी देखा
ऊँचे नंगे पर्वतों से
एक काले बादल का
टुकड़ा आया
और धूप की सारी किरणों को
समेट लिया
नगर-नगर अंधियारा फैला
घर-घर से
चमगादड़ों की चीखें गूंजी
पेड़-पेड़ पर
उल्लू बोले
बादल के इस
काले बिछू ने
बुद्धि को भी डंक मार दिया
लोग एक दूसरे का मांस
नोचने लगे
बेटे ने बाप को
काट के फेंका
भाई ने भाई का
गला घोंटा
अब हर एक के हाथ में
टूटी तलवारें
हर एक के कपड़ों प्र
अपने ही ख़ून की छींटे
हर दिशा हैं
लाशों के ढेर
उन पर झपटते
आवारा कुत्ते
मंडलाती चीलें और कौए
मैं
हड्डियों के पंजरे के अन्दर
अपनी आँखों की ठिठकी ठहरी
सहमी बूँदों में
सिमट गया हूँ
कौए,चीलें और
आवारा कुत्ते
मुझको एक हड्डियों का
पिंजरा समझ कर छोड़ गये हैं
और मेरी भर्राई आँखों में
यह रिसता सपना
कि उस दोपहर को
केवल एक बार, मैं
फिर से देखूँ
हड्डियों के पिंजरे से निकलूँ
आकाशों में उड़ जाऊँ .
________________________________________________________
यह परछाई कैसी
यह परछाई कैसी
पेड़ तले यह सिसकी किसकी
कौन यह कन्या
किस की प्रतीक्षा
सीता बन कर कल भी रोई
रोना इस के जन्म जन्म में
कैसी शक्ति शिव-शंकर की
कैसी भक्ति राम रमय की
आओ फिर से इसको
शक्ति बनाकर
दिल से लगाकर
दाग़ मिटाएं मानवता से .
_____________________________________________________________
धरा के ज्योतिहीन
है धरा के ज्योतिहीन
किसको ढूँढ़ रहा हे तू
गगन की उंचाईयों में
सागर की गहराइयों में
मस्जिद और मन्दिरों में
न मिला हे
न मिलेगा कभी
भजन,पूजन
साधना,आराधना करनी हे तो
कर मानवता की
वह तो मानवता की मला में है
या फिर तेरे मन-मन्दिर में
तेरे भीतर अंतर-आत्मा तेरी
स्वयं तेरा परमात्मा है .
__________________________________________________
एक पूरी सृष्टि हूँ मैं
कुछ कभी नहीं है
सब कुछ हे अब
पास मेरे
मेरे भीतर की पूरी
सृष्टि में सब कुछ सिमटा
दु:खों के पहाड़
शंकाओं के जंगल
आशाओं के दिए
अधखिले फूल
भावनाओं की नदियाँ
आंसुओं की वर्षा
अब आवश्यकता थी
तुन्हारे संग की
तुम्हारी कुछ स्म्रतियों के रूप में
और तुम्हारा यह संग
तुम्हारी स्मृतियाँ
हर पग पर
मेरा साथ देती हे
मेरे साथ होती हे
एक मधुर जीवन-संगनी की तरह .
____________________________________________________
घायल घाटी
आज घाटी के लोगों ने
अपनी माँ को
अमृत पिलाया
कि अम्र हो जाए
मैया
किन्तु अमृत में
विष मिला था
घाटी का कण-कण
हो क्षत-विक्षत
और घायल घटी का
सारा शरीर हो गया
विष सागर .
__________________________________________________________
वह तो चली गई
आह
वह रूठ के कहा चली गई
चुपके से कहां चली गई
उसका जि़क्र अब
केवल एक सुंदर स्वप्न लगता है
उसकी स्मृति अब
एक मनोहर अतीत बन गया है
जब से पुर्खों से उसका नाम सुना
तब से अक्सर सोचता हूँ
केसी रही होगी
मोहिनी सी सूरत
पवन सी कोमल
पानी सी निर्मल
पर हाय वह तो चली गई
शरमाई होगी
भूखों के खली पेट देखकर
निर्धनों के नंगे शरीर देखकर
न्याय के हाथ में कशकोल देखकर
डर और गबरा गई होगी
विष बुझे बाणों को देखकर
बेचैन हो गई होगी
फिलस्तीन के बच्चों की
चीत्कार सुनकर
श्वेत अफ्रीकियों के
अत्याचार देखकर
उकता गई होगी
लोहे की मशीनों को देखकर
रोबोट को देखकर
सहम गई होगी
लगता हे सदैव के लिए
चली गई
केवल अपना नाम छोडकर
चार अक्षरों का
एक खोखला शब्द
जिसे कहते हें
मानवता .
____________________________________________________
No comments:
Post a Comment