Sunday, February 9, 2014



निष्फल उपासना

कांच के सपनों से
रात की शिला को काट कर
अपने मन-मन्दिर के लिए
एक प्रतिमा तराशना
उसी ने मुझे सिखाया था
किन्तु सपनों के तीक्ष्ण टुकड़े
मेरी आत्मा को घायल कर गए
और मन-मन्दिर में
प्रेम के सारे शलोक
शंकाओं के धूप की 
सूली पर चढ़कर
धुआं हुए
भावनाओं के टिमटिमाते दीप
प्रतिमा को ढूंढते ढूंढते
शोक और शर्म से
अपने ही आंसुओं की
बाढ़ में डूबकर
आत्महत्या पर उतर आये
विशवास और श्रद्धा के सजदे
माथे पर ही दम तोड़ बैठे ...
कि उसने मुझे
कांच के टूटे सपने
प्रेम के बेतरतीब शलोक
भावनाओं के अधबुझे दीप
माथे पर शापित सजदे
और रात की कठोर शिला तो दी
किन्तु
अपने नाम की प्रतिमा
और मेरी नींदे
मुझसे छीन लीं .
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साकार सपना

कल रात मैंने
एक सपना देखा
अचानक मेरी उंगलियाँ
लम्बी होती गईं
साँप बनती गईं
और मेरे ही शरीर को
डसने लगीं .
और आज प्रातःकाल
जब मैं घर से निकला
रात्रि का सपना
मेरे घर के आँगन में
मेरी प्रतीक्षा कर रहा था .
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पायल की झंकार भी दुँगी
(एक विरह गीत)

उज्ज्वल मुख और सुन्दर हर कण
निकले  हो  क्या  बन-ठन,   चन्दा
आज  रात  तुम   छत   पर  आना
दुँगी  मैं   यह   तन -   मन , चन्दा

दुःख   होता   है   देख   देख    कर
यहाँ     -   वहाँ   से     चलना    तेरा
दिल   के    द्वार    खुले   रखे    हैं 
   जाना  तुम इक क्षण , चन्दा

छुप    जाते    हो    बीच बीच    में
तड़पाते     हो    क्यों    मन     मेरा
पलकों    के     रास्ते     से     आना
दूँगी    मैं     यह  चितवन  , चन्दा

प्यार    का     इन्द्गधनुष  भी दूँगी
और   आँसू    के   कुछ     तारे   भी
तुम      आना       मैंने     रखा      है 
आँखों     का     एक  गगन , चन्दा

पायल     की     झंकार     भी   दूँगी
गजरे    की    महकार    भी      दूँगी
बदले       में         मांगूंगी       केवल
प्रीत    का    ही एक कंगन , चन्दा

तेरे    पग  -   पग      फूल     बिछाऊँ
हर    एक   पग   पर   गीत   सुनाऊँ
बिन्दिया    का   दर्पण     भी     दूँगी
तुम      ही     मेरे     साजन     चन्दा
बैठ    के    बालों    की    छाया     में
होठों    की    मदिरा    तुम     चखना
यौवन   के   सब   बेर   और   जैफल
कर    दूँगी    मैं    अर्पण     ,    चन्दा

बाँहों      का      बेला      भी       दूँगी
आँखों      का     जादू      भी      दूँगी
और    साँसों    की    यह    गर्मी  भी
तुम   ही   हो    मन -  भवन , चन्दा

उज्ज्वल   मुख  और सुन्दर हर कण
निकले  हो   क्या   बन - ठनचन्दा
आज  रात  तुम  छत  पर   आना
दुँगी  मैं   यह    तन-मन  ,   चन्दा
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लौ के सहारे

वह कह रही थी
हमें ऊपर जाना है  
चाँद से भी ऊपर
जहाँ हम एक दूजे के
दुःख-सु:ख बाँटें
जहाँ हमारे सपने
दम न तोड़ें
जहाँ हमारी आकांक्षा
बाँझ न बने
जहां हमारा सम्बन्ध
कंगाल न बने
वह  कह रही थी
थकना नहीं
साहस से काम लेना
मैं तुम्हारे साथ रहूंगी
तुम्हारी आशा बनकर

मैं चलता रहा
उसके इस प्रोत्साहन के
दीप की लौ के सहारे
घोर अँधेरे में भी
रास्ता निकालता रहा
जब मैंने उपर
चाँद से  भी  ऊपर
अपने पीछे देखा
वहां
दम तोड़ते सपने
बाँझ इच्छाएं
थोथे सम्बन्ध
मुझ पर हंस रहे थे
मेरी आशा
पहले ही सोपान पर
टूट चुकी थी
और उसका प्रोत्साहन
पहले सोपान के बीच खड़ा
एक प्रश्न बन गया था .
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मैं तो घास हूँ , उग आऊँगा*
(पंजाबी कवि,अपने मित्र “पाश” की शहादत पर)

चलो उसे भी
कान्धा दूँ
जिसको मैंने चाहा था
जीवन से भी अधिक
जो हंसता था
किन्तु
उसके दिल की बेतरतीब धडकनें
ठीक सुनाई देती थीं
उसने सरे मज़दूरों की पीड़ा
दिल में बसाई थी
उनके दुःख दर्द को
शब्दों का आकार दिया था
मैं जनता था मारा जाएगा
की वह लोगों को
दर्पण दिखाने निकला था
कौन चाहता है यहाँ
देखना अपना यथार्थ
और कल जब मैंने
उसकी लाश देखी
मैं सोच रहा था
क्या यह सचमुच मर गया है  
किन्तु
उसका संघर्ष
उसकी कविताएँ ही तो है
उसका जीवन,उसकी आत्मा
और “सत्य” का सम्बन्ध तो
होता है आत्मा से
आत्मा कभी मरती नहीं
मैं इसी सोच में था कि
उसके होंठ जैसे हिलने लगे
और वह जैसे कहने लगा 
अपने क़ातिलों से
“मेरा क्या करोगे
मैं तो घास हूँ,हर चीज ढक लूंगा
हर ढेर पर उग आऊँगा
मैं घास हूँ , मैं अपना कम करंगा
मैं तुम्हारे सरे किए-धरे पर
उग आउंगा”*.
·        पंजाबी कवि अवतार संह पाश की कविता की पंक्तियाँ
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यादों का दर्पण

मेरी हर ओर यादें
और मैं यादों के इस दर्पण में
कभी हंसता हूँ
कभी रोता हूँ
और यह हंसी हर समय
अधूरी रह जाती है  
निर्धन षोडषी के यौवन की तरह
जो आने से पहले ही
चला जता है  
किसी सुन्द्र स्वप्न की तरह
और मैं खड़ा
ताकता रहता हूँ
इस दर्पण को
जो दर्पण को
जो दर्पण मेरी छाया है  
जो दर्पण मेरी आशा है  
      *
इस दर्पण से उभरता है  
एक चित्र,ख़ामोश
अजन्ता की प्रतिमा की तरह
गुम-सुम
एलोरा की गुफाओं की तरह
विरक्त
मेरी प्रेमिका का चित्र
समय हे हाथों
वह भी मजबूर
समय के हाथों
मैं भी क्षत-विक्षत  
और यादों के इस दर्पण में
कभी रोता हूँ
कभी हंसता हूँ
    *
इस दर्पण से
उभरते हें कुछ चेहरे
धूल से लिथड़े हुए
श्रमिकों के,किसानों के
बूढों और जवानों के
हर एक के चहरे पर
एक ही प्रश्न
एक ही शब्द
रोटी,रोटी,रोटी
हर एक के अधरों पर
केवल मानवता के घर्म की
चर्चा
और भूख,प्यास की
निर्मम मर
और यादों के इस दर्पण में
कभी हंसता हूँ
कभी रोता हूँ  
       *
इस दर्पण के ह्रदय से
उभरती हे एक तल्ख़ आवाज़  
जो कहती है  
इस शताब्दी के लोगों
सभ्यता के दावेदारो
ऐ मानवता के मृत्युदाताओ
एक भारतीय नारी पूछती है  
एक गम की मरी पूछती है  
ये मेरी बहनें आज भी क्यों
आत्महत्याएं करती हैं
यह सीता और यह मरयम क्यों
भूखी-प्यासी मरती हैं  
और मैं
यादों के इस दर्पण में
कभी हंसता हूँ
कभी रोता हूँ.

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मेरे नाम की पुस्तक

आज मैंने फिर
वह पुस्तक खोली
जो समय की गर्द से
अटी पड़ी थी
और उलझ गया
उसके पन्नों में
पहले ही पन्ने पर
मोटे अक्षरों में
लिखा है  
दुर्घटना शब्द
सब से बड़ी दुर्घटना
इस पुस्तक का आरम्भ
इसका जन्म
और फिर हर पन्ने पर
दुःख भरी कहानियाँ
मार-धाड़ भावनाओं की
आत्महत्या इच्छाओं की
शायद संसार की
सब से दुखी पुस्तक
जो केवल रुलाती हे
हंसती कभी नहीं
हर पन्ने पर
पढ़ने वाले ने
अपनी उँगलियों के
चिन्ह छोड़ दिए हैं  
इस पुस्तक के पन्ने
आंसुओं के अक्षरों से लिखे हुए
प्रत्येक पन्ने पर
दुःख,दर्द और घाव
और यह पुस्तक
इस संसार के
पुस्तक भंडार में
मेरे नाम की पुस्तक हे
स्वयं मैं .

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