रणभूमि
गोरी हथेली पर
तुम्हारा मौन चहरा
शांत
गम्भीर
प्रश्नों का एक ढेर लिए
जैसे सुनहरी थाली पर
अधखिला गुलाब
तुम्हारी पथराई आँखें
शापित
बर्फीली
उस स्वयंवर का
प्रतिबिम्ब लिए
जो देखते-देखते
रणभूमि में बदल गया
और अब अपने
राजकुमार की प्रतीक्षा में टकटकी बाँधे
तुम्हारा नख-शिख
पवित्र
क्रोध –भरा
जैसे अपने भक्तों से
रूठी देवी
आओं
कहीं तुम टूट न जाओ
इस बारुद भरे शहर में
तुम्हें अपने मन-मन्दिर में
मैं बसा लूँ
जहाँ श्रद्धा की घंटियाँ
तुम्हारे स्वागत में , कब से
बज उठने को उत्सुक हैं .
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सत्य का चाँद
चाँद से कहो
अभी न जन्म ले
आकाश की कोख से
धरती वासियों ने
हज़ार हाथों में
पत्थर ले रखें हैं .
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अपंग सोच
अँधेरी रात कब तक
प्रकाश के चैत्यों पर
व्यंग्य यूँ करती रहे ?
सोच कब तक
सर झुकाए
कब तक
अपनी आहट से भी यूँ
डरती रहे ?
और कब तक
मौसम-ए-बारूद में
तर्क के हत्याग्रह
सजाये जायेंगे ?
चेतना पर
चित पर
पहरे बिठाए जाएंगे ?
या कि नागिन के से गुण
देखकर
अपने बच्चों को निगल ले जाएगें
या कि अपने हाथ-पांव काटकर
अपने अस्तित्व को अपंग करें ?
अपने विचारों की तरह
अपने विवेक की तरह .
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अमावस
सिरहाने रखे सपने
सांप बन जाते हैं
जब बारूदी धुएँ में
पूर्णिमा
अमावस बन जाती है
बच्चों के पालने
प्रश्न बन जाते हैं
जब गोलियों की गून्ज
लोरी बन जाती है .
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शाप
(शहीद मशीर-उल-हक और पाश के हर बच्चे के नाम)
मत रो, मुन्ने
तुम्हारे पिता-का सा पाप
मैंने भी किया
और समय का शाप
मैं भी झेलूँगा
तुम कल
मेरे बच्चों के संग
जी भर कर रोना.
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हर समय एक प्रश्न
हर समय सोचता हूँ
कि जीवन के
इन प्रश्नों के उत्तर
कहां से लाऊं ?
और समय के पथ पर
उभरने वाली शंकाओं
की उलझन को
कैसे सुलझाऊं
हर कदम पर एक प्रश्न है
और हर मोड़ पर एक शंका
उभरती है
अपने अनबूझे शब्दों से
उनकी निष्कृति ढूढता हूँ
पर मिलती नहीं
हर प्रश्न एक चोट
और हर शंका एक घाव
देती है
हर प्रश्न के बहुत सरे उत्तर
और हर उत्तर के साथ
ढेर सारी शंकाएं
और मैं
इन प्रश्नों और शंकाओं में
डूबा जता हूँ
और अन्त में
खड़ा हो जता हूँ मैं भी
अपने ही समक्ष
एक प्रश्न-चिन्ह सा.
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आदर्श
मेरे शहर में
आना हो तो
अपनी आँखें निकालकर
सिगरेट-बिट की तरह
पांव-तले मसल दो .
आदर्शों के सरे पन्ने
सुखी लकड़ी की तरह
जला दो .
क़लम की जीभ
किसी सिरफिरे के सर की तरह
काट दो .
कि अब यहाँ
देखना,सोचना
और लिखना है पाप .
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एक आरोप
(अपने ही अपहरण पर)
मेरी स्मृति में
इस मौसम के सभी
दृश्य हें
वह दृश्य भी जब कल
मेरी जीभ काट दी गई
मेरे कानों में
पिधला सीसा डाला गया
मेरी उंगलियाँ
तराशी गईं
और यह कह कर छोड़ा गया
कि जा
हम तुम पर दया करते हैं
तुम्हें जीवित छोड़ कर
अब मैं अधिकतर सोचता हूँ
कि क्या मैं सचमुच जीवित हूँ
या यह केवल एक आरोप है
जिससे मेरा सब कुछ
मेरी स्मृति में बसा पूरा संसार
और उस संसार का
हर रूप ,हर दृश्य
घायल होता जा रहा है
मेरे अतीत की भाँती.
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कंटीली झाड़ियाँ
तुमने हमारे खेतों में
कंटीली झाड़ियाँ उगानी चाहीं
कि वह हमारे
सारे विवेक धरातल पर
फैल जाएँ
और हमारे विचारों के पग
जहाँ भी जाना चाहें
घायल होकर वापस आएं
तुमने सींचना चाहा
इन कंटीली झाड़ियों को
हमारे ह्ज़ारों बच्चों के
ताज़ा-ताज़ा खून से
लेकिन
अब तुम ने देखा कि
हमारे उज्ज्वल विचारों की
धूप पड़ते ही
तुम्हारी ये कंटीली झाड़ियाँ
मुरझा गई हैं
काश , तुमने सोचा होता
कि ये काले बारूद की
कंटीली झाड़ियाँ
केवल काले विचारों की
बांज धरती में ही
पनपती हैं
और हमारी धरती
लल्लेश्वरी के शैव-दर्शन
और नुन्द ऋषि के ऋषि–दर्शन
का प्यारा संगम
इस धरती की झीलों में
कमल के फूल खिलते हैं
जो दृढ़ वैराग्य हैं
हमारे चरित्र के प्रतीक
देवी-देवताओं के आसन
इस धरती के अंग अंग में
उस केसर की सुगन्ध है
जो गुरुओं का न्यारा रंग है
और जिसका तिलक
दिव्य नेत्र को भी
आकार बख्शता हे
हमारी धरती चिनार के वृक्ष
उगाती है
जिनकी हरित-शीत छाँव में
मन को शान्ति मिलती है
हम तुम्हारी इन कंटीली झाड़ियों को
जड़ से उखाड़ देंगे
अब पूरे संसार को
आतंक की इन
कंटीली झाड़ियों की नहीं
बल्कि शान्ति के महकते
फूलों की ज़रूरत है
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