Monday, February 10, 2014



रणभूमि

गोरी हथेली पर
तुम्हारा मौन चहरा
शांत
गम्भीर
प्रश्नों का एक ढेर लिए
जैसे सुनहरी थाली पर
अधखिला गुलाब

तुम्हारी पथराई आँखें
शापित
बर्फीली
उस स्वयंवर का
प्रतिबिम्ब लिए
जो देखते-देखते
रणभूमि में बदल गया
और अब अपने
राजकुमार की प्रतीक्षा में टकटकी बाँधे
तुम्हारा नख-शिख
पवित्र
क्रोध –भरा
जैसे अपने भक्तों से
रूठी देवी

आओं
कहीं तुम टूट न जाओ
इस बारुद भरे शहर में
तुम्हें अपने मन-मन्दिर में
मैं बसा लूँ
जहाँ श्रद्धा की घंटियाँ
तुम्हारे स्वागत में , कब से
बज उठने को उत्सुक हैं .
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सत्य का चाँद

चाँद से कहो
अभी न जन्म ले
आकाश की कोख से
धरती वासियों ने
हज़ार हाथों में
पत्थर ले रखें हैं  .
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अपंग सोच

अँधेरी रात कब तक
प्रकाश के चैत्यों पर
व्यंग्य यूँ करती रहे ?
सोच कब तक
सर झुकाए
कब तक
अपनी आहट से भी यूँ
डरती रहे ?
और कब तक
मौसम-ए-बारूद में  
तर्क के हत्याग्रह
सजाये जायेंगे ?
चेतना पर
चित पर
पहरे बिठाए जाएंगे ?
या कि नागिन के से गुण
देखकर
अपने बच्चों को निगल ले जाएगें
या कि अपने हाथ-पांव काटकर
अपने अस्तित्व को अपंग करें ?
अपने विचारों की तरह
अपने विवेक की तरह .
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अमावस

सिरहाने रखे सपने
सांप बन जाते हैं  
जब बारूदी धुएँ में
पूर्णिमा
अमावस बन जाती है

बच्चों  के पालने
प्रश्न बन जाते हैं
जब गोलियों की गून्ज
लोरी बन जाती है .
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शाप
(शहीद मशीर-उल-हक और पाश के हर बच्चे के नाम)

मत रो, मुन्ने
तुम्हारे पिता-का सा पाप
मैंने भी किया
और समय का शाप
मैं भी झेलूँगा
तुम कल
मेरे बच्चों के संग
जी भर कर रोना.
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हर समय एक प्रश्न

हर समय सोचता हूँ
कि जीवन के
इन प्रश्नों के उत्तर
कहां से लाऊं ?
और समय के पथ पर
उभरने वाली शंकाओं
की उलझन को
कैसे सुलझाऊं
हर कदम पर एक प्रश्न है  
और हर मोड़ पर एक शंका
उभरती है  
अपने अनबूझे शब्दों से
उनकी  निष्कृति ढूढता हूँ
पर मिलती नहीं
हर प्रश्न एक चोट
और हर शंका एक घाव
देती है  
हर प्रश्न के बहुत सरे उत्तर
और हर उत्तर के साथ
ढेर सारी शंकाएं
और मैं
इन प्रश्नों और शंकाओं में
डूबा जता हूँ
और अन्त में
खड़ा हो जता हूँ मैं भी
अपने ही समक्ष
एक प्रश्न-चिन्ह सा.
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आदर्श

मेरे शहर में
आना हो तो
अपनी आँखें निकालकर
सिगरेट-बिट की तरह
पांव-तले मसल दो .
आदर्शों के सरे पन्ने
सुखी लकड़ी की तरह
जला दो .
क़लम की जीभ
किसी सिरफिरे के सर की तरह
काट दो .
कि अब यहाँ
देखना,सोचना
और लिखना है पाप .

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एक आरोप
(अपने ही अपहरण पर)

मेरी स्मृति में
इस मौसम के सभी
दृश्य हें
वह दृश्य भी जब कल
मेरी जीभ काट दी गई
मेरे कानों में
पिधला सीसा डाला गया
मेरी उंगलियाँ
तराशी गईं
और यह कह कर छोड़ा गया
कि जा
हम तुम पर दया करते हैं  
तुम्हें जीवित छोड़ कर
अब मैं अधिकतर सोचता हूँ
कि क्या मैं सचमुच जीवित हूँ
या यह केवल एक आरोप है  
जिससे मेरा सब कुछ
मेरी स्मृति में बसा पूरा संसार
और उस संसार का
हर रूप ,हर दृश्य
घायल होता जा रहा है  
मेरे अतीत की भाँती.
   
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कंटीली झाड़ियाँ

तुमने हमारे खेतों में
कंटीली झाड़ियाँ उगानी चाहीं
कि वह हमारे
सारे विवेक धरातल पर
फैल जाएँ 
और हमारे विचारों के पग
जहाँ भी जाना चाहें
घायल होकर वापस आएं 
तुमने सींचना चाहा
इन कंटीली झाड़ियों को
हमारे ह्ज़ारों बच्चों के
ताज़ा-ताज़ा खून से
लेकिन
अब तुम ने देखा कि
हमारे उज्ज्वल विचारों की
धूप पड़ते ही
तुम्हारी ये कंटीली झाड़ियाँ
मुरझा गई हैं 
काश , तुमने सोचा होता
कि ये काले बारूद की
कंटीली झाड़ियाँ
केवल काले विचारों की
बांज धरती में ही
पनपती हैं 
और हमारी धरती
लल्लेश्वरी के शैव-दर्शन
और नुन्द ऋषि के ऋषि–दर्शन
का प्यारा संगम
इस धरती की झीलों में
कमल के फूल खिलते हैं 
जो दृढ़ वैराग्य हैं 
हमारे चरित्र के प्रतीक
देवी-देवताओं के आसन
इस धरती के अंग अंग में
उस केसर की सुगन्ध है 
जो गुरुओं का न्यारा रंग है 
और जिसका तिलक
दिव्य नेत्र को भी
आकार बख्शता हे
हमारी धरती चिनार के वृक्ष
उगाती है 
जिनकी हरित-शीत छाँव में
मन को शान्ति मिलती है
हम तुम्हारी इन कंटीली झाड़ियों को
जड़ से उखाड़ देंगे
अब पूरे संसार को
आतंक की इन
कंटीली झाड़ियों की नहीं
बल्कि शान्ति के महकते
फूलों की ज़रूरत है

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दिल,दिलबर,दिलदार की भाषा

हिंदी हो जन -जन  की भाषा
तेरी  मेरी   यह   अभिलाषा
प्यार की भाषा यार की भाषा
दिल,दिलबर,दिलदार की भाषा
इस   भाषा   को   फैलाएगे
दूर   दूर   तक   पहुँचाएँगे
इसकी  सीमा  उत्तर -दक्षिण
इसकी  बाँहें  पूर्व्  - पश्चिम
भेद  से ,भय से ऊपर हे यह
आर्यवर्त  का  सूत्र  हे   यह
अक्षर  अक्षर  अमृत  प्याला
शब्दों  का  हे  रूप  निराला
सागर  सागर   जेसे   पानी
आकाशों  में  इसकी   वाणी
संत कबीर के दोहों वाली कर
जायसी  के शब्दों  की पाली
सूरदास  का  दर्पण  है  यह
मीरा का भी  चिनतन है यह
आओ इसको दिल से लगाकर
नमन  करेंगे  शीष  झुकाकर
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आत्मा में बसा मरुस्थल

आज मुझे छुपा लो
अपने पोर-पोर में
मुझे समेट लो
आज मैं डर गया हूँ
बिखर गया हूँ
कि आखिर कब तक
सत्य न बोलने की पीड़ा को
चाय के कडुवे घूंट
के साथ बांधे रहूँ
अपनी दम-घुटती आकांक्षाओं
बिखरी आहों
जवान चेहरे पर
उभरी झुर्रियों
और आत्मा में बसे
मरुस्थल पर
फीकी हंसी की चादर ओढूं
अब में यह सब झेलते-झेलते
एक पत्थर बन गया हूँ.
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सीमा हो तो नीलगगन की

आओ
आज इस विशाल धरती पर
शान्ति की एक चादर बिछाएं
और यह प्रतिष्ठित करें
कि सारी मानवता की सफलता
केवल शान्ति में है .
आओ कि
प्रकृति के इस मोहक चित्र से
आक्रोश की परत उठाएं
आओं
मारा-मरी अब बन्द करें हम
संकीर्णता से न डरें हम
भेद-भाव की ज़िद हम छोड़ें
मानवता से मुंह न मोड़ें
और धरती से
विकट विनाश की छाया हटाएं
शान्ति के ही गीत गाएं
और आज
इस धरती पर खिंची गई
सारी आबड-खाबड़ सीमाएं
मिटाएं
और फिर
सीमा हो तो नीलगगन की
भूख प्यास मिट जाए जग की
जीने को हर प्राण अकेला
हो फिर आतुर.
   
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काले बादल का टुकड़ा

दोपहर की रूपहली धूप को
जाते हुए मैंने भी देखा
ऊँचे नंगे पर्वतों से
एक काले बादल का
टुकड़ा आया
और धूप की सारी किरणों को
समेट लिया
नगर-नगर अंधियारा फैला
घर-घर से
चमगादड़ों की चीखें  गूंजी
पेड़-पेड़ पर
उल्लू बोले
बादल के इस
काले बिछू ने
बुद्धि को भी डंक मार दिया
लोग एक दूसरे का मांस
नोचने लगे
बेटे ने बाप को
काट के फेंका
भाई ने भाई का
गला घोंटा
अब हर एक के हाथ में
टूटी तलवारें
हर एक के कपड़ों प्र
अपने ही ख़ून की छींटे
हर दिशा हैं
लाशों के ढेर
उन पर झपटते
आवारा कुत्ते
मंडलाती चीलें और कौए
मैं
हड्डियों के पंजरे के अन्दर
अपनी आँखों की ठिठकी ठहरी
सहमी बूँदों में
सिमट गया हूँ
कौए,चीलें और
आवारा कुत्ते
मुझको एक हड्डियों का
पिंजरा समझ कर छोड़ गये हैं
और मेरी भर्राई आँखों में
यह रिसता सपना
कि उस दोपहर को
केवल एक बार, मैं
फिर से देखूँ
हड्डियों के पिंजरे से निकलूँ
आकाशों में उड़ जाऊँ .
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यह परछाई कैसी

यह परछाई कैसी
पेड़ तले यह सिसकी किसकी
कौन यह कन्या
किस की प्रतीक्षा
सीता बन कर कल भी रोई
रोना इस के जन्म जन्म में
कैसी शक्ति शिव-शंकर की
कैसी भक्ति राम रमय की
आओ फिर से इसको
शक्ति बनाकर
दिल से लगाकर
दाग़ मिटाएं मानवता से .
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धरा के ज्योतिहीन

है धरा के ज्योतिहीन
किसको ढूँढ़ रहा हे तू
गगन की उंचाईयों में
सागर की गहराइयों में
मस्जिद और मन्दिरों में
न मिला हे
न मिलेगा कभी
भजन,पूजन
साधना,आराधना करनी हे तो
कर मानवता की
वह तो मानवता की मला में है  
या फिर तेरे मन-मन्दिर में
तेरे भीतर अंतर-आत्मा तेरी
स्वयं तेरा परमात्मा है  .
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एक पूरी सृष्टि हूँ मैं

कुछ कभी नहीं है  
सब कुछ हे अब
पास मेरे
मेरे भीतर की पूरी
सृष्टि में सब कुछ सिमटा
दु:खों के पहाड़
शंकाओं के जंगल
आशाओं के दिए
अधखिले फूल
भावनाओं की नदियाँ
आंसुओं की वर्षा
अब आवश्यकता थी
तुन्हारे संग की
तुम्हारी कुछ स्म्रतियों के रूप में
और तुम्हारा यह संग
तुम्हारी स्मृतियाँ
हर पग पर
मेरा साथ देती हे
मेरे साथ होती हे
एक मधुर जीवन-संगनी की तरह .

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घायल घाटी

आज घाटी के लोगों ने
अपनी माँ को
अमृत पिलाया
कि अम्र हो जाए
मैया
किन्तु अमृत में
विष मिला था
घाटी का कण-कण
हो क्षत-विक्षत
और घायल घटी का
सारा शरीर हो गया
विष सागर .
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वह तो चली गई

आह
वह रूठ के कहा चली गई
चुपके से कहां चली गई
उसका जि़क्र अब
केवल एक सुंदर स्वप्न लगता है  
उसकी स्मृति अब
एक मनोहर अतीत बन गया है  
जब से पुर्खों से उसका नाम सुना
तब से अक्सर सोचता हूँ
केसी रही होगी
मोहिनी सी सूरत
पवन सी कोमल
पानी सी निर्मल
पर हाय वह तो चली गई
शरमाई होगी
भूखों के खली पेट देखकर
निर्धनों के नंगे शरीर देखकर
न्याय के हाथ में कशकोल देखकर
डर और गबरा गई होगी
विष बुझे बाणों को देखकर
बेचैन हो गई होगी
फिलस्तीन के बच्चों की
चीत्कार सुनकर
श्वेत अफ्रीकियों के
अत्याचार देखकर
उकता गई होगी
लोहे की मशीनों को देखकर
रोबोट को देखकर
सहम गई होगी
लगता हे सदैव के लिए
चली गई
केवल अपना नाम छोडकर
चार अक्षरों का
एक खोखला शब्द
जिसे कहते हें
मानवता .

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